كتاب وأراء

غادريــنــي

غـادريـني..
وارحلي عـني بـعـيدا..
ودعـي العـمر مـن الـنسيان..
يـمـتـد سـعـيـدا..
ودعـيـنـي..
فـأنـا لا أقـبـل العـيش..
بأحـضان الأنـيـن ِ..

قـد تـغـيرت كـثـيـرا..
ووجـدت الآن ذاتـي..
وغـدت دنياي عـيـدا ً..
رائـعـا ً حـلـوا ً مـثـيـرا..
بعـد أن كـنت حـزينا ًوأسيرا..
أتـلـظى في قـيـودي بحـياتي..

آه ٍ.. كم كنت أعـاني..
مـن جـراحات الـزمان ِ..
غـيـر أني قـد برئت اليوم منها..
بعـد إشراق الـتي كـنت أطـلـتُ..
البحث عـنها..

إنها قـد أصبحت كل الـوجـود..
أسمعـتـني بحـنان ٍ دافئ ٍ..
لحن الخلود..
ها أنا الآن محاط بالأماني..
والأمانـي.. كالـورود..

غـادريـني..
قـد وجـدت الـحـب يــدنو.. فـنسيت..
كل ما كان مـع الـماضي الحـزيـن ِ..

غـادريـنـي..
قـد كـفانـي.. ما أتانـي
مـن عـذابات ٍ.. عـلى مـر السنين ِ
غـادريـني..
وارحلي عـني بـعـيـدا ً..
ودعـي العـمـر مـن الـنسيان..
يـمـتـد سـعـيـدا.. ودعـيـنـي..
غـادريـني.. غادريني.
يا همومي وأحزان سنيني.

بقلم : سلطان بن محمد

سلطان بن محمد